कमलेश फाइटर
कानपुर नगर। वाह रे कानून, वाह रे न्याय! किसी ने सही कहा है कि यदि किसी को गलत तरीके से अपराधी साबित कर दिया जाए, तो अपनी बेगुनाही साबित करने में उसकी जिंदगी गुजर जाती है। कानपुर के महाराजपुर थाने से जुड़ा करीब 35 साल पुराना मामला भी कानून व्यवस्था और न्याय प्रक्रिया की रफ्तार पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। वर्ष 1991 में दर्ज मुकदमों को लेकर तत्कालीन थानाध्यक्ष और उनकी पुलिस टीम पर कथित फर्जी मुठभेड़ दिखाने तथा 12 लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाने के आरोप लगे थे। अब उपलब्ध तहरीर के मुताबिक मुकदमा पंजीकृत कर लिया गया है इस मामले में संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की कार्रवाई के लिए 17 अगस्त 2026 को प्रार्थना पत्र दिया गया था ।
मामले की शुरुआत चकेरी थाना क्षेत्र के गांधीग्राम निवासी देव प्रसाद पाठक की ओर से उत्तर प्रदेश शासन को दिए गए शिकायती प्रार्थना पत्र से हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी ने मुफ्त में प्लॉट नहीं देने की रंजिश में उनके छोटे भाई राकेश पाठक समेत 12 लोगों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कराए थे। शिकायत के बाद शासन ने प्रकरण की जांच अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी), खंड कानपुर से कराने के निर्देश दिए थे।
नर्वल मोड़ पर लूट की साजिश और मुठभेड़ दिखाने का आरोप
अभिलेखों के मुताबिक, तत्कालीन पुलिस ने दावा किया था कि 22 अगस्त 1991 को मुखबिर से सूचना मिली कि नर्वल मोड़ स्थित जीटी रोड पर बदमाश वाहनों को रोककर लूटपाट करने वाले हैं। पुलिस टीम मौके पर पहुंची और 23 अगस्त की रात करीब 12:30 बजे एक डीसीएम को रोककर लूटने का प्रयास करने वाले 12 लोगों को गिरफ्तार करने का दावा किया गया। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से अवैध असलहे, कारतूस और बम बरामद होने की बात भी कही थी।
इस आधार पर महाराजपुर थाने में मुकदमा अपराध संख्या 275/1991 समेत शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत अन्य मुकदमे दर्ज किए गए थे। इन मामलों में राकेश पाठक समेत 12 लोगों को आरोपी बनाया गया था।
सीआईडी जांच में सामने आए अलग तथ्य
शिकायत की जांच तत्कालीन सीआईडी निरीक्षक आरपी सिंह ने की थी। उपलब्ध तहरीर के अनुसार, जांच की अंतिम प्रगति आख्या 25 सितंबर 1995 को सीआईडी मुख्यालय, लखनऊ से अनुमोदित की गई थी। जांच के दौरान डीसीएम चालक उमाशंकर पासी और क्लीनर बृजेन्द्र सिंह के बयानों ने पुलिस की कथित मुठभेड़ की कहानी पर सवाल खड़े किए।
दोनों गवाहों के अनुसार, वे डीसीएम में साबुन लादकर कानपुर से बनारस जा रहे थे। रास्ते में एक सिपाही उनके वाहन में बैठा और बाद में कुछ अन्य लोग भी सवार हो गए। गवाहों ने बताया कि डीसीएम को महाराजपुर थाने ले जाया गया, जहां कुछ लोगों को पकड़ा गया। उन्होंने कथित तौर पर पुलिस द्वारा पकड़े गए लोगों से मारपीट करने और बाद में अन्य लोगों को पकड़कर लाने की बात भी कही।
चालक और क्लीनर ने यह भी कहा कि घटना के दिन नर्वल मोड़ पर उनकी डीसीएम को बदमाशों ने रोककर लूटने का प्रयास नहीं किया था। तहरीर के मुताबिक, दोनों के बयान तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत न्यायालय में भी दर्ज कराए गए थे।
घर से उठाकर ले जाने और लाइसेंसी हथियार दिखाने का आरोप
जांच के दौरान शिकायतकर्ता देव प्रसाद पाठक सहित अन्य लोगों के बयानों का भी उल्लेख किया गया। आरोप था कि राकेश पाठक और कुछ अन्य लोगों को घर से सोते समय उठाकर गिरफ्तार किया गया था। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि सदाशिव पाठक की लाइसेंसी दोनाली बंदूक और देव प्रसाद पाठक की लाइसेंसी रायफल को पुलिस अपने साथ ले गई और बाद में मुकदमे में बरामदगी के रूप में दिखाया।
सीआईडी जांच के निष्कर्षों में मौखिक, अभिलेखीय और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मूल्यांकन के आधार पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ गंभीर आरोप प्रथम दृष्टया पाए जाने का उल्लेख है। तहरीर में आरोप लगाया गया कि पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए, लोगों को अवैध रूप से हिरासत में रखा और न्यायालय में झूठे आरोपपत्र प्रस्तुत किए।
कई पुलिसकर्मियों की मौत, कुछ हो चुके हैं सेवानिवृत्त
इस प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आरोपों में नामजद पुलिसकर्मियों में से कई की मृत्यु हो चुकी है, जबकि कुछ सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उपलब्ध तहरीर में छह पुलिसकर्मियों की मृत्यु के कारण उन्हें आरोपों से अलग रखने का उल्लेख किया गया है। शेष संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं में अभियोग दर्ज करने का अनुरोध किया गया है।
तहरीर 17 अगस्त 2026 की है और इस पर सीआईडी खंड कानपुर के निरीक्षक एवं विवेचक सुशील कुमार के हस्ताक्षर का उल्लेख है। इसमें मामले की विवेचना अपराध अनुसंधान विभाग से कराए जाने का अनुरोध भी किया गया है।
करीब साढ़े तीन दशक पुराने इस प्रकरण ने पुलिस की जवाबदेही और न्याय प्रक्रिया में होने वाली देरी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। शिकायत के बाद जांच हुई, गवाहों के बयान दर्ज हुए और जांच में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे, लेकिन कानूनी कार्रवाई का मौजूदा चरण इतने लंबे अंतराल के बाद सामने आया है।








